purushottam vishvkarma
Wednesday, October 29, 2014
ग़रीब देश के अमीर सांसद
चाचा दिल्लगी दास ने जब सांसदों के भत्ते पाँच गुना बढ़वा लेने की कवायद के समाचार पढे तो अचानक उनकी आंखों में पानी आ गया जब वर्तमान में सांसदों को मिलने वाले भत्तों पर गौर किया तो उनकी विपन्नता पर तरस आया और चाचा की आंखों से अविरत्न अश्रुधारा प्रवाहित होने लगी। जब मन कुछ हल्का हुआ तो रुंधे गले से बोले कि आज बिचारे इन सांसदों को मिलता ही क्या है, सिर्फ माह में छियालिस हजार नकद और फ्री बिजली, पानी, टेलिफोन, आजीवन सपत्नीक रेल्वे पास, वायुयान की बत्तीस टिकटें जैसी चंद टुच्ची सुविधाओं के अलावा। माना कि पाँच व षोंर् में इन पर साढे आठ नो सौ करोड़ रुपये खर्च हो जाते हैं मगर वो कौन-से पूरे के पूरे इनकी जेब में जाते हैं।
चाचा आगे बोले कि आज राजनीति की दुर्दशा के लिए ये अत्यल्प ही जिम्मेदार हैं जब इतनी कम तनख्वाह में कुशल श्रमिक तक नहीं मिलते तो फिर इतने से भत्ते व नाकाफी सहूलियतों में स्वच्छ राजनीति की छवि वाले सांसद कहां से उपलब्ध होंगे जरा गौर करने की बात हैं। इन भत्तों से तो वर्तमान में हाथ लगे सांसदों को रजनीतिक क्षेत्र में बनाये रखना भी दुष्कर होगा। इस खरीद फरोख्त को रोकने के लिए ये भत्ते व अन्य सुविधाएं पर्याप्त साबित नहीं होगी। ये भत्ते ही तो कारण है देश की वर्तमान दुर्दशा के, जब तक सांसदों का ध्यान इन भत्तों से नहीं हटेगा तो ये देश के विषय पर कब सोचेंगें।
चाचा ने अपना तफसला मुसलसल जारी रखते हुए अपनी वाकिफीयत जाहिर की, कह रहे थे कि माना कि संसद में सत्तापक्ष के अलावा प्रतिपक्ष भी होता है और सत्तापक्ष के हर जायज नाजायज कदम का विरोध कर अपना अस्तित्व कायम रखने की चेष्टाएं करते रहते है मगर विरोध तब करते है जब कुर्सी की लड़ाई होती है जब पेट की लड़ाई का मामला होता है तो ये ही सांसद अपने-अपने सिद्धांत, आपसी रंजिशें व प्रतिद्वन्द्विता भुला कर एक होकर लड़ते है। सिर्फ ऐसे ही अवसरों पर इनको एक राय होते देखा जा सकता है।और जब इनके भत्ते बढ़ जाएंगे तो ये मेज थपथपा कर उस फैसले कर स्वागत करेंगें। एक दूसरे के गले मिलकर बधाईयां देंगे।
चाचा जरा झुंझला कर बोले कि कुछ समझ में नहीं आ रहा कि सरकार इनके भत्ते बढ़ाने में इतनी हील-हुज्जत क्यों कर रही है। पिछली सरकारों की भांति बढ़ा क्यों नही ंदेती। ये सांसद है कोई सरकारी कर्मचारी तो है नहीं सो पूर्व स्पीकर की रहनुमाई में कमेठी बनाने,‘कैग' को सौंपने किसी बाहरी एजेंसी को मामला सुपुर्द करने, आयोग गठन करने जैसी अड़चनें डाली जा रही हैं। इसका विरोध करने वाले साहबान को शायद सांसदों की माली हालत का पता नहीं, कुल जमा 300 सांसद ही तो करोड़पति हैं 30धन्ना सेठ बाकी बेचारे तो आज भी गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन कर रहे है। इनको जितना मिलता है उससे कहीं अधिक तो किसी कमाऊ सरकारी महकमें का चपरासी भी झटक लेता है महिनें भर में। इनके भत्तों से कई गुणा ज्यादा देश के रईशजादे तफरीह में उड़ा देते हैं। उनकी तुलना में तो सांसद मोटी रस्सी से खूंटे पर बंधी काली गाय से प्रतीत होते है जिसको तौलकर सूखा चारा डाला जाता है।
आज चाचा इन सांसदों की बेचारगी पर तरस खाकर खासे मेहरबान नजर आ रहे थे बोले कि चाहे कोई कमेठी बने या किसी की भी रहनुमाई कोई आयोग गठित है इन सांसदों की मांग मानी ही जानी चाहिए। इनके साथ-साथ इनकी सांसद निधि को भी दो से बढ़ा कर पांच करोड़ कर देनी चाहिए। माना कि पूर्व ‘राजग' सरकार ने इस मांग को निर्दयता पूर्वक रौंद दिया था मगर इस ‘सम्प्रग' सरकार को ऐसी गलती कभी नहीं करनी चाहिए। भला दो करोड़ रु. सालाना कोई सांसद निधि हुई। ये सरासर एक सांसद की खुली तौहीन है इतनी सी निधि के कारण ही तो हमारे मुल्क को अभी भी गरीब मुल्कों में शुमार किया जाता है।
Sunday, October 5, 2014
किराये के कौए
किराये के कौए
चाचा दिल्लगी दास की निहायत ही बेतुकी और अटपटी बातें सुन कर के कोई भी मंद बद्धि से मंद बुद्धि व्यक्तिभी अगर चाहे तो आसानी से समझ सकता है कि चाचा दिल्लगी दास सनकी तो पैदाइशी थे ही और ऊपर से सठिया भी गए लगते हैं I इसके बावजूद भी अगर आपको यकीन नहीं आ रहा हैं तो इनकी आज की ताज़ा बातें ही सुन कर तस्दीक कर सकते हैं I पता है चाचा आज आते ही क्या बोले,वो बोले कि "मैं कई दिनों से सोच रहा हूँ कि कुछ कौए पाल लूं " अब तो आप भी ठीक से समझ ही गए होंगे कि चाचा जान सनक व सठियाने की सनद लिए धड़ल्ले से खुले आम घूम रहे हैं I आपकी तरह पहले मैं भी कुछ ऐसा ही समझ रहा था मगर चाचे आगे की पूरी बात सुन कर मैं अब समझा हूँ कि मैंने तब कितना ग़लत समझा था चाचा दिल्लगी दास को I
चाचे ने समझाने के अंदाज़ से बताया कि वे सचमुच वाले कौए पल रहें हैं न कि वैसे जैसे हमने दिल्ली और जयपुर में पाल रखें हैं जो बेकार की काँव काँव करते हैं योजनायें तो क्या कोयले तक खा जाते हैं, और न वैसे जैसे कि आकासवाणीं और दूरदर्शन वालों ने पाल रखें हैं जो सिर्फ घड़ी देख कर ही काँव काँव शुरू करते हैं और घड़ी देख कर के काँव काँव कर बंद कर देते हैं,और न ही खबरिया चेनलों वाले जैसे कौए जो जरा सी भीड़ देखी नहीं और हो जाते हैं काँव काँव करना शुरू I ऐसे जैसे गिद्धों को बुला रहें हों कि देखो यहां रहा आपका शिकार ,बड़ी बड़ी बोटियाँ तुम खा लेना और बची खुची खुरचन हमारे लिए छोड़ देना I चाचा आगे बोले कि मैं सचमुच उन कौओं जैसे कौए पाल रहा हूँ जो किसी की मुंडेर पर बैठ कर काँव काँव कर आगाह करते हैं कि मेहमान आ रहे हैं ,मेहमान आ रहे हैं, थोड़ी रोटियां ज्यादा बनाना या जिन्हें कोई विरहणी कहेगी की उड़ जा रे कागा मेरे पिया घर आये ,और हाँ मेरे पाले हुए कौए लोगों के श्राद्ध भी खायेंगे I खास तौर पर तो मैं श्राद्धपक्ष में श्राद्ध खाने के लिए अपने कौए किराये पर दूंगा और ये कमाई करने का एक नया आइडिया मुझे मेरे पडौस में घटे एक हैरतंगेज वाकये के बाद आया,अगर तुम सुनोगे तो फिर तुम भी शर्तिया मेरी तरह कौए ही पालोगे,अगर तुम्हें कभी कुछ भी पालने का शौक चर्राया तो I
चाचा आगे बोले कि कपूत हुआ यूं कि मेरे पड़ौसीजी के पुत्रों ने अपने बाप का पहला श्राद्ध निकाला था,श्राद्ध निकाला तो बड़े अनमने मन से था पर निकला जरूर था I मेरे पड़ौसीजी रिटायर्ड होने तक छककर रिश्वत खाते रहे थे , आज उनके घर में जो कुछ भी है वो सब रिश्वत ही का है और मुझे तो यह संसय भी है कि उन्होंने कहीं चारों बेटे भी उत्कोच ले कर ही तो पैदा नहीं किये हों या पैदा करने के बाद उत्कोच ले ली हों तभी तो उनके बेटे उनका श्राद्ध बड़े अनमने मन से महज़ लोक लाज की खातिर निकाल रहे थे I उनके चारों बेटे बड़े बड़े थालों में भांति भांति की खाने की चीजें लिए काफी देर तक छत पर खड़े रहे मगर कोई भी कौआ उनमें चौंच तक नहीं मारने नहीं आया और वो ही कौए नीचे फुटपाथ पर बैठे एक बूट पालिश वाले के पिता का श्राद्ध चट कर आये थे I पत्त्तलों में रखी मिठाई तो खा गए सो खा गए थे पट्ठों ने बच्चों के लिए रखी थोड़ी बहुत मिठाई भी जबरन छीन कर खा डाली I मगर वो ही कौए मेरे पड़ौसीजी का श्राद्ध नहीं खा रहे थे I तआज्जुब तो इस बात का हो रहा था कि हकीर से हकीरचीज खा जाने वाले कौए रिश्वत के अन्न का एक दाना भी नहीं खा रहे थे I
अगर कोई लालची कौआ उनकी छत पर जाने कुचेष्टा करता तो बाकि कौए उसे डांट देते ,काँव काँव कर उसे आगाह कर देते कि देखो ये अपवित्र अन्नं है इसे कोई न खाए वरना योनि भृष्ट हो गायेगा I लगता तो यूं था जैसे वो कौए मेरे पड़ौसी की छत के आस पास इस लिए जमे थे कि कोई कौआ नादानी से कुछ खा न ले, जैसे उनको अपनी पूरी कौम के बदनाम होने का खपचा हो I कौए की कौम भी बड़ी काइयां किस्म की होती है सब कुछ खा जाने वाली जात मेरे रिश्वतखोर पड़ौसीजी का श्राद्ध नहीं खा रही थी, उनके पुत्र काफी देर तक तो मिन्नतें करते रहे आखिर भुनभुनाते हुए बोले जंगली कहीं के I जरा पता तो लगाना कि कहीं पर कौए किराये पर मिलतें हैं क्या I मैंने जब ये सुना तो मुझे तीव्रता से काक प्रेम हो गया और कौए पालने की धुन सवार हो गई ,वैसे ये धंदा है काफी मुनाफे वाला I
पुरुषोत्तम विश्वकर्मा
Friday, September 10, 2010
ईद मुबारक
मुबारक हो मुबारक ईद हो भाई
अगरचे याद करने पर भी तुमको याद न आऊं
तो कोई फर्क न पड़ता
गिला शिकवा मोहब्बत में
गवारा ही नहीं मुझको
मुबारकबाद देता हूँ
तवक्को है इसे तस्लीम कर लेना
गुज़ारिश है दुआ इक मांगना ये कि
हमारी इस मोहब्बत को सलामत
रख खुदा मेरे
मैं भी इबादत में कहूँगा
ओ मेरे मौला अता कर इतनी खुशियाँ
यार को मेरे कि उसकी झोली कि
उसकी झोली फैलाई छौटी लगे उसको
खुदा से यह भी कह दूंगा कि
रब बाँहों को मेरी उतनी लम्बाई
अता कर कि
पसारूं और समंदर पार
बैठा ही गले लग जाऊं
अपने यार से इस दिन
Sunday, July 4, 2010
Monday, June 14, 2010
हम प्राणी बिन पूंछ
वैसे तो इस कमबख्त पूंछ पर कई नामी-गिरामी कलमकारों ने कई-कई बार कितना-कितना लिखा है मगर ये पूंछ है भी तो भारत-पाक सम्बंधों पर द्विपक्षीय वार्ताओं जैसी, जिस पर कोई कितना भी जी भरकर लिख लें कुछ न कुछ और लिखने की गुंजाइश रह ही जाती है। आज इस पर आपको यकीन चाहे न आये मगर कल देख लेना जब किसी को लिखने के लिए कुछ भी मौजू नहीं मिलेगा तो उसे यह पूंछ ही नजर आएगी, कलम भांजने के लिए।
मैंने जब जब भी किसी पूंछधारी को अपनी पूंछ सीधी, टेढ़ी, ढीली, ऐंठ व हिला कर अपने भाव प्रकट करते देखा तब तब मुझे अपनी पूंछ विहीनता पर तरस आया। ऐसा भी नहीं है कि हमारे पूर्वजों के कभी पूंछ होती ही नहीं थी, वैज्ञानिक बता रहे हैं कि हमारे आदी मानवजी के पूंछ होती थी मगर सभ्यता की सनक में उसने पूंछ का इस्तेमाल ही नहीं किया। फलतः उसकी पूंछ घिसते-घिसते लुप्त हो गई, यानि अपने बेअक्ल अज्जाद सभ्यता जैसी हकीर चीज की खातिर पूंछ जैसी नियामत से हाथ धो बैठे। उनकी उस बेवकूफी का खामियाजा हम ही क्या हमारी अगली नस्लें भी भुगतेगी।
जो भी आप में से पुंछ की अहमियत समझते हैं उनको अफसोस तो होता होगा कि हमारे पूंछ नहीं है और मौके बेमौके पर हैरत भी होती होगी कि हमारे सिर्फ पूंछ ही नहीं है, और तो कोई कमी नहीं नजर आती। कभी-कभार पूंछ की जरुरत भी महसूस हुई होगी और इस संभावना को भी एकदम नकारा नहीं जा सकता कि इस तरफ आपका ध्यान ही नहीं गया हो क्योंकि रुढ़िवादिता कल्पनाशीलता को प्रभावित अवश्य करती है।
कुछ भी हो अगर पूंछ होती तो निश्चित रुप से शाखामृग जैसी ही होती जिसकी सहायता से शरीर पर कहीं भी बैठी मक्खी उड़ाने में सुगमता रहती। पूंछ की स्थिति देख कर मातहत अफसरों के मूड को पढ़ लेते। तेज चलते पंखें की हवा से फड़फडा़ते कागजों को टाइपिस्ट दोनों हाथों से टाइप करते-करते पूंछ से ही थामे रख लेती। भूगोल के अध्यापक दोनों हाथ जेबों में डाले-डाले ही नक्षे पर झट से पूंछ का सिरा रख कर समझा देते कि फलां स्थान यहां स्थित है। विद्यार्थी रैगिंग के समय किन्हीं दो पूंछों में खेंच के गांठ लगा देते। यानि कुल मिलाकर हर कोई पूंछ का कुछ न कुछ सार्थक उपयोग अवश्य कर लेता। मोहल्ले की खवातीन किसकी पूंछ में ऐरा लग गया है, विषय पर गपशप कर टाइम पास कर लेती।
अगर पूंछ होती तो रोजगार पर भी प्रभाव होता। हर एक अस्पताल में एक पूंछ विशेषज्ञ रखना पड़ता, शहरों, कस्बों, में गली-गली में पूंछ पार्लर होते, पूंछ को लंबा और पुष्ट करने के तेल व दवाईयां बेचने वालों की भीड़ फुटपाथों पर मिलती। डाक्टर नब्ज, सीना, पेट का चैक अप करने के बाद पूंछ को भी जड़ के पास से टटोलते कि कहीं मरीज की पूंछ ढीली तो नहीं। कलर थैरेपी में पूंछ पर एक खास रंग के कपडे़ की चिंदी बांधने में काफी सहुलियत रहती।
पूंछ होती तो यकीनन सरकारी नौकरियों में तो कद,वजन, छाती, पेट के साथ-साथ पूंछ की भी न्यूनतम लम्बाई निर्धारित की जाती जो कि मैदानी, पहाड़ी सभी लोगों पर समान रुप से लागू होती। यहां तक कि आरक्षित वर्ग को भी इस पूंछ की लम्बाई के मामले में कोई रियायत नहीं मिलती। लड़की-लड़के का रिश्ता तय करते वक्त भी इसको खास तवज्जो दी जाती। ऐसे में लड़के का बाप हाथ जोड़कर कहता भाई साहब माना कि आपका लड़का शिक्षित है, सुंदर है, अच्छी तनख्वाह लेता है मगर इसकी पूंछ देखिए इसे मैं तो क्या कोई गरीब भी अपनी बेटी देकर बिरादरी में अपनी नाक नहीं कटवाना चाहेगा। पूंछ के होने से छोटी-मोटी दिक्कतें तो आती।
आती तो आती कौन परवाह करता उनकी। दर्जियों को सिलाई करते वक्त पूंछ के लिए जगह रखनी पड़ती, जिसके चारों ओर गोटे व कसीदे का काम करना पड़ता, यात्री वाहनों में हिदायतें लिखवानी पड़ती कि चलते वाहन में यात्री अपनी पूंछ बाहर न निकाले। अखबारों में ऐसी खबरें अक्सर आया करती हैं कि एक भीड़ भरी बस में एक वृद्ध महिला यात्री की पूंछ का कचूमर निकला या रवाना हो चुकी बस में दौड़कर चढ़े यात्री की पूंछ फाटक में फंस कर कटी अथवा सरकारी अस्पताल में एक आदिवासी महिला ने एक पूंछ विहीन बच्चे को जन्म दिया, जिस विचित्र बच्चे को देखने अपार भीड़ उमड़ी।
अगर किसी को शास्त्रों के बारे में गूढ़ ज्ञान है तो उसे यह भी पता होगा कि कलियुग में बिना पूंछ वाले सभी देवगण पृथ्वी पर प्रकट नहीं हो पाएंगे, सिर्फ हनुमानजी ही हमारी रक्षार्थ आ रहे हैं।इस प्रकार हर दृष्टि से पूंछ का महत्व हैं। हमारे पूंछ होनी चाहिए, मगर है नहीं। इसके लिए हमें कुछ करना चाहिए। वैज्ञानिकों को मिसाइलें बनाने जैसे बेकार के कामों से हटा कर आदमी के पूंछ विकसित करने जैसे काम में लगा देना चाहिए। वैज्ञानिकों को इस शोध में सौ पचास वर्ष लगेंगे जो हमें कतई गवारा नहीं। जिसकी वैकल्पिक व्यवस्था के रुप में पूंछ प्रत्यारोपण की व्यवस्था की जा सकती हैं। जानवरों की पूंछें काटने के मामले में मेनका जी को मनाने की जरुरत जरुर पड़ेगी। मगर वो मान जाएगी, क्योंकि यह कोई धर्म, सम्प्रदाय, क्षेत्र विशेष का मामला न होकर समूचे मुल्क का मामला है। कोई भी राजनीतिक पार्टी लोकसभा में पूंछ प्रस्ताव उठाएगी तो उसका टेबलें थपथपा कर जोरदार स्वागत किया जाएगा जैसा सांसदों के भत्ते व सुविधाएं बढ़ाए जाने के अवसरों पर अक्सर होता है।
जब पूंछ प्रत्यारोपण संभव हो जाएगा तो जनभावनाओं का आदर करते हुए प्रत्येक नागरिक को अपनी पसंदीदा पूंछ चुनने का मौलिक अधिकार भी दिया जाएगा। ये और बात है कि कुत्ता, बिल्ली, शेर , चीता, घोङा, बंदर, लंगूर आदि श्रेष्ठ श्रेणी की पूंछें आम आदमी तक नहीं पहुंच पाएगी। उसे तो फुटपाथ पर अपने स्वयं के खर्चे से चूहे, गिरगिट या छिपकली आदि की पूंछ ही लगाकर संतोष करना पड़ेगा। खतरनाक जानवरों की पूंछें तो नेता अफसर ले उड़ेंगे। अभिनेता घोड़े या नील गायों की पूंछें पसंद करेंगे वहीं तारिकाएं व आधुनिकाएं बकरी या खरगोश जैसी छोटी पुंछे चुनेंगी ताकि देह प्रदर्शन में बाधक न बनें। बालों के विगों की तरह बाजार में स्वदेशी व आयातित कृत्रिम पूंछें भी मिलने लग जाएगी। कई अस्पतालों में तो पूंछ स्केण्डल भी होंगे। मेरे तो एक छोटी सी पूंछ उगना शुरु हो गई आप अपनी रीढ़ खम्ब के निचले सिरे को ध्यान से टटोलें कि कहीं पूंछ वाली जगह में थोड़ा बहुत उभार प्रतीत हो रहा हो।
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