मुबारक हो मुबारक ईद हो भाई
अगरचे याद करने पर भी तुमको याद न आऊं
तो कोई फर्क न पड़ता
गिला शिकवा मोहब्बत में
गवारा ही नहीं मुझको
मुबारकबाद देता हूँ
तवक्को है इसे तस्लीम कर लेना
गुज़ारिश है दुआ इक मांगना ये कि
हमारी इस मोहब्बत को सलामत
रख खुदा मेरे
मैं भी इबादत में कहूँगा
ओ मेरे मौला अता कर इतनी खुशियाँ
यार को मेरे कि उसकी झोली कि
उसकी झोली फैलाई छौटी लगे उसको
खुदा से यह भी कह दूंगा कि
रब बाँहों को मेरी उतनी लम्बाई
अता कर कि
पसारूं और समंदर पार
बैठा ही गले लग जाऊं
अपने यार से इस दिन
आदरणीय विश्वकर्मा जी ,दामोदर जी की ग़ज़ल पर मेरी टिप्पणी के उपर आपकी टिप्पणी पढ कर सुखद अनुभूति हुई। मेरा मानना है कि सीखने की कोई उम्र नहीं होती। हो सकता है मेरा ही ग्यान कमज़ोर हो आपसे भी कुछ सीखने मिल जाये तो मुझको खुशी होगी,मैंने जांगिड़ जी की कई ग़ज़ल पहले भी पढी है। वर्तमान ग़ज़लों में प्रथम ग़ज़ल को मैंने तक़्तीअ करने की कोशिश की पर असफ़ल रहा हो सके तो मुझे पहली गज़ल का छंद समझा दीजिये तो मुझ पर अहसान होगा और फिर मैं अपने कमेन्ट के लिये दामोदर जी से सरे आम मुआफ़ी मांग लूंगा। धन्यवाद। ये बात मैं आपको ई-मेल करना चाह था पर आपका ईमेल उल्लेखित नहीं है, साथ ही जांगिड़ जी के टिप्पणी कालम में इसे लिखना तहज़ीब के खिलाप लगा इसलिये आपके ब्लोग के माध्यम से संवाद स्थापित करने की गुस्ताख़ी कर रहा हूं, पढ्ने के तुरंत बाद इसे डिलिट कर लें तो मुझे ख़ुशी होगी।
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